कानून तक | विशेष रिपोर्ट
भारत में न्यायपालिका ने एक और संवेदनशील मुद्दे पर अपना ध्यान केंद्रित किया है—
वो है ऑटिज़्म और अन्य बौद्धिक/विकासात्मक अक्षमता वाले लोगों की देखभाल और सुरक्षा।
सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में एक जनहित याचिका (PIL) पर नोटिस जारी किया है, जिसमें मांग की गई है कि भारत में ऐसे सभी आवासीय और संस्थागत केयर होम्स के लिए स्पष्ट कानून, नीति, निगरानी और नियम बनाए जाएँ।
क्यों यह मामला इतना अहम है?
इस याचिका का मूल कारण यह है कि देशभर में बहुत से केयर होम्स ऐसे चल रहे हैं जहां ऑटिज़्म और अन्य बौद्धिक दिव्यांगता वाले लोग रहते हैं, लेकिन वहाँ की स्थितियाँ अक्सर बेहद खराब, अमानवीय और अमान्यनीय बताई गई हैं।
याचिका में कहा गया है कि:
- कई संस्थानों में दुर्व्यवहार, जैसे शारीरिक, मौखिक, भावनात्मक उत्पीड़न होता है
- निवासियों को देरी से या बिना उपचार के जीवन जीने को मजबूर होना पड़ता है
- कुछ मामलों में यौन शोषण तक की शिकायतें मिली हैं
- कई होम्स बिना मजबूत निगरानी और नियमों के काम कर रहे हैं
- निजी संस्थान उच्च शुल्क वसूलते हैं लेकिन अपेक्षित देखभाल नहीं देते
यह मामला इसलिए महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि ये लोग आम नागरिक की तरह अपनी बात खुद नहीं रख सकते—और अगर वहाँ कोई व्यवस्था नहीं है, तो उनके अधिकारों का भयानक उल्लंघन हो रहा है।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या किया?
सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति बी. वी. नागरत्ना और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की बेंच ने याचिका पर सरकार और संबंधित विभागों को नोटिस जारी किया है।
इसका मतलब है कि सबसे ऊपर की अदालत ने मुद्दे को गंभीरता से लिया है और केंद्र/राज्य सरकारों से जवाब माँगा है।
जिस पर कोर्ट ने नोटिस जारी किया है उनमें शामिल हैं:
- केंद्र सरकार
- विकलांगता के सशक्तिकरण विभाग (Department of Empowerment of Persons with Disabilities)
- राष्ट्रीय ट्रस्ट (National Trust)
- दिल्ली सरकार
- बीमा नियामक प्राधिकरण (Insurance Regulatory and Development Authority of India)
याचिका किसने दायर की?
यह PIL एचआरडीवाईए सरस फाउंडेशन नामक NGO द्वारा दायर की गई है, जिसमें विकलांग व्यक्तियों के अधिकारों के लिए काम किया जाता है।
याचिका में मांग की गई है कि:
- हर जिले में आवासीय सुविधाएँ उपलब्ध कराई जाएँ
- एक राष्ट्रीय विशेषज्ञ समिति बनाई जाए
- ऐसे केयर होम्स के लिए बाध्यकारीनियम और SOPs तय किए जाएँ
- नियमित स्वास्थ्य जांच, प्रशिक्षित देखभाल करने वाले और चिकित्सीय सेवाएँ सुनिश्चित हों
- वित्तीय मामलों में पारदर्शिता हो और शोषण / उपेक्षा से सुरक्षा मिले
केयर होम्स में क्या समस्याएँ हैं?
याचिका में केंद्रित समस्याएँ इस प्रकार से उजागर की गई हैं:
1. दुर्व्यवहार और उपेक्षा
केयर होम्स में रह रहे लोग—ख़ासकर ऑटिज़्म और बौद्धिक अक्षमता वाले—अकसर अपनी आवाज़ उठाने में सक्षम नहीं होते।
इसलिए उन पर होने वाला दुर्व्यवहार, भेदभाव या उपेक्षा लंबा समय तक बिना पता चले रहता है।
2. उच्च शुल्क व अपेक्षित सुविधाओं का अभाव
कई निजी संस्थान
₹50,000 से
₹2,60,000 महीने तक शुल्क लेते हैं और कुछ मामलों में
₹21,00,000 से अधिक एक-बार शुल्क।
लेकिन इसके बावजूद वहां बुनियादी आवश्यकताएँ जैसे पौष्टिक भोजन, चिकित्सा, प्रशिक्षित स्टाफ उपलब्ध नहीं कराई जाती।
3. भीड़भाड़ और असुरक्षित स्थितियाँ
दिल्ली के एक आशा किरण केयर होम का हवाला देते हुए याचिका में कहा गया कि वहां 1000 लोग रहते हैं, जो स्थान की क्षमता से लगभग दोगुना है, जिससे रहने की स्थिति औसत से नीचे और असुरक्षित है।
4. महिलाओं और लड़कियों की विशेष भेद्यता
याचिका में कहा गया है कि महिलाओं और लड़कियों को अस्वच्छ परिस्थितियों, शारीरिक और यौन हिंसा का सामना कराना पड़ रहा है और उन्हें अनैच्छिक इलाज तक दिया जाता है, जैसे इलेक्ट्रोशॉक थेरेपी।
आंकड़े क्या कहते हैं?
भारत की 2021 की जनगणना के अनुसार लगभग 26.8 मिलियन लोग विकलांग हैं, जो कुल आबादी का लगभग 2.21% है — और इनमें से बहुत से लोग अपने दैनिक जीवन में सहायता की ज़रूरत रखते हैं।
एनसीआरबी (National Crime Records Bureau) के मुताबिक़ 2022 में मानसिक या शारीरिक विकलांग महिलाओं के खिलाफ़ बलात्कार के 110 मामले दर्ज किए गए हैं, साथ ही कई राज्यों में केयर होम्स में मौतों, हमलों और दुर्व्यवहार की भी रिपोर्ट्स आई हैं। ये आँकड़े दिखाते हैं कि कानून बन जाने के बाद भी अमल (implementation) और निगरानी की कमी कितनी खतरनाक हो सकती है।
याचिका की मुख्य मांगें
याचिका में कोर्ट से ये मुख्य निर्देश देने की भी मांग की गई है:
हर जिले में विकलांग लोगों के लिए आधारभूत आवासीय सुविधाएँ हों
न्यूनतम मानक
(mandatory minimum standards) तय हों—
- स्वच्छ रहने की स्थिति
- प्रसारित शिक्षा और सामाजिक समर्थन
- प्रशिक्षित स्टाफ
- नियमित स्वास्थ्य और चिकित्सा सुविधाएँ
- पारदर्शी वित्तीय संरचनाएँ
- निगरानी, ऑडिट और जवाबदेही प्रणालिया
- राष्ट्रीय विशेषज्ञ समिति का गठन जिसमें विकलांग प्रतिनिधि भी शामिल हों
आखिर क्यों अब आवश्यक है कानून का सख़्त क्रियान्वयन?
भारत के पास पहले से ही Rights
of Persons with Disabilities Act, 2016 और Constitution
के अनुच्छेद 14,
19, 21 जैसे मौलिक अधिकार मौजूद हैं।
लेकिन याचिका का कहना है कि:
1. केवल कानून होना पर्याप्त नहीं है
2. उसकी निगरानी और क्रियान्वयन होना चाहिए
3. और अगर किसी भी संस्थान में Standards का उल्लंघन हो रहा है, तो उसे रोका भी जाना चाहिए
आम आदमी के लिए समझना ज़रूरी
यह निर्णय सिर्फ अदालत की आवाज़ नहीं है— यह उन लाखों परिवारों के लिए उम्मीद की किरण है जिनके जीवन में कभी-कभी अँधेरा सी भी आती है। जब कोई व्यक्ति अपनी बात खुद़ नहीं कह सकता, तो क़ानून, व्यवस्था और अदालतें उसकी आवाज़ बनती हैं।
यह याचिका न्यायपालिका को याद दिलाती है कि
“देखभाल” = सिर्फ़ आवास नहीं,
“संरक्षण” = सिर्फ़ फ़ार्मूला नहीं,
बल्कि इंसान की गरिमा और अधिकारों की रक्षा है।
वक़्त किस दिशा में आगे बढ़ रहा है?
अब कोर्ट इस मामले में सुनवाई जारी रखेगी — एक ऐसा फ़ैसला जो भारत भर में विकलांगों की देखभाल, सुरक्षा, चिकित्सीय सुविधाएं, रोज़गार और सामाजिक समर्थन को पूरी तरह से बदल सकता है।
आने वाले हफ्तों में केस की अगली तारीख तय होगी और अगर कोर्ट निर्देश जारी करता है, तो यह PIL लंबे समय तक इतिहास में एक बड़ा परिवर्तनकारी निर्णय बनकर रह जाएगा।
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