कानून तक | विशेष रिपोर्ट
तलाक के मामलों में सबसे ज़्यादा विवाद जिस मुद्दे पर देखने को मिलता है, वह है गुज़ारा-भत्ता, जिसे आम भाषा में भरण-पोषण कहा जाता है। अक्सर सवाल उठता है—
क्या तलाक के बाद
पति को हमेशा पत्नी
को पैसा देना पड़ता
है?
क्या कामकाजी महिला भी गुज़ारा-भत्ता
मांग सकती है?
कितने समय तक और
कितनी राशि दी जाती
है?
और सबसे अहम—अदालत
किन आधारों पर इसका फ़ैसला करती है?
पारिवारिक अदालतों में हर दिन ऐसे सैकड़ों मामले आते हैं, जहाँ तलाक से ज़्यादा लड़ाई गुज़ारा-भत्ते को लेकर होती है। इस रिपोर्ट में हम इसी मुद्दे को आसान और साफ़ भाषा में समझने की कोशिश कर रहे हैं।
गुज़ारा-भत्ता क्या है?
गुज़ारा-भत्ता वह आर्थिक सहायता है, जो तलाक या अलगाव के बाद एक जीवनसाथी को दूसरे जीवनसाथी से मिलती है, ताकि वह सम्मानजनक जीवन जी सके।
कानून का उद्देश्य यह नहीं है कि किसी को सज़ा दी जाए, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि—
“तलाक के बाद कोई भी पक्ष आर्थिक रूप से असहाय न रह जाए।”
गुज़ारा-भत्ता अस्थायी भी हो सकता है और स्थायी भी।
गुज़ारा-भत्ता क्यों दिया जाता है?
अदालतों का मानना है कि विवाह के दौरान पति-पत्नी दोनों एक-दूसरे पर निर्भर होते हैं। कई बार—
- पत्नी ने घर-गृहस्थी के कारण नौकरी छोड़ दी होती है
- बच्चों की परवरिश में अपना करियर त्याग दिया होता है
- वर्षों तक आर्थिक रूप से पति पर निर्भर रही होती है
ऐसे में तलाक के बाद अचानक महिला को बेसहारा छोड़ देना न्यायसंगत नहीं माना जाता। यही कारण है कि गुज़ारा-भत्ता का प्रावधान कानून में रखा गया है।
क्या गुज़ारा-भत्ता केवल महिला को ही मिलता है?
यह एक आम गलतफ़हमी है।
कानून
की नज़र में गुज़ारा-भत्ता लिंग पर आधारित नहीं है।
यदि पति आर्थिक रूप
से कमज़ोर है और पत्नी
सक्षम है, तो कुछ
परिस्थितियों में पति भी गुज़ारा-भत्ता मांग सकता है।
हालाँकि व्यवहारिक रूप से ज़्यादातर मामलों में यह सहायता महिलाओं को ही दी जाती है, क्योंकि सामाजिक संरचना में आज भी महिलाओं की आर्थिक निर्भरता अधिक देखने को मिलती है।
गुज़ारा-भत्ता किन कानूनों के तहत दिया जाता है?
भारत में गुज़ारा-भत्ता कई कानूनों के तहत दिया जा सकता है:
1. दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125
यह सबसे सामान्य और तेज़ राहत देने वाला कानून है। इसके तहत—
- पत्नी
- बच्चे
- बुज़ुर्ग माता-पिता
भरण-पोषण की मांग कर सकते हैं।
2. हिंदू विवाह अधिनियम
इस कानून के तहत—
- तलाक की कार्यवाही के दौरान
- और तलाक के बाद
अस्थायी और स्थायी गुज़ारा-भत्ता दिया जा सकता है।
3. घरेलू हिंसा से संरक्षण कानून
यदि महिला घरेलू हिंसा की शिकार रही है, तो उसे—
- रहने का अधिकार
- आर्थिक सहायता
- चिकित्सा और बच्चों के खर्च
का अधिकार मिलता है।
4. मुस्लिम महिला अधिकार कानून
तलाक के बाद मुस्लिम महिला को—
- इद्दत अवधि
- और उसके बाद भी उचित भरण-पोषण का अधिकार दिया गया है।
गुज़ारा-भत्ता कितने प्रकार का होता है?
1. अस्थायी गुज़ारा-भत्ता
यह तलाक की कार्यवाही के दौरान दिया जाता है, ताकि मामला चलने तक पीड़ित पक्ष खर्च चला सके।
2. स्थायी गुज़ारा-भत्ता
यह तलाक के अंतिम फ़ैसले के समय तय होता है और लंबे समय या आजीवन दिया जा सकता है।
गुज़ारा-भत्ता तय करते समय अदालत क्या देखती है?
अदालत मनमाने ढंग से राशि तय नहीं करती। कई बातों को ध्यान में रखा जाता है:
- पति और पत्नी की आय
- जीवन-स्तर (शादी के समय कैसा जीवन था)
- उम्र और स्वास्थ्य
- बच्चों की ज़िम्मेदारी
- नौकरी की संभावना
- विवाह की अवधि
- अलगाव के कारण
अदालत का उद्देश्य यह होता है कि तलाक के बाद जीवन-स्तर अत्यधिक न गिरे।
क्या कामकाजी महिला को गुज़ारा-भत्ता मिलता है?
यह सवाल आज सबसे ज़्यादा पूछा जा रहा है। केवल नौकरी होना गुज़ारा-भत्ता न मिलने का कारण नहीं है। यदि महिला की आय—
- बहुत कम है
- जीवन-यापन के लिए पर्याप्त नहीं
- या पति की आय से बहुत कम है
तो अदालत उसे भी गुज़ारा-भत्ता दे सकती है।
क्या गुज़ारा-भत्ता जीवन भर देना पड़ता है?
हर मामले में नहीं। गुज़ारा-भत्ता—
- कुछ मामलों में सीमित अवधि के लिए
- कुछ में पुनर्विवाह तक
- और कुछ में जीवन भर
दिया जा सकता है। यदि महिला पुनः विवाह कर लेती है, तो आम तौर पर गुज़ारा-भत्ता समाप्त हो जाता है।
क्या पति गुज़ारा-भत्ता देने से मना कर सकता है?
कानूनी रूप से नहीं। यदि अदालत ने आदेश दे दिया है और फिर भी भुगतान नहीं किया जाता, तो—
- वेतन से कटौती
- संपत्ति ज़ब्त
- यहाँ तक कि जेल
की कार्रवाई भी हो सकती है।
गुज़ारा-भत्ता और बच्चों का खर्च
बच्चों का भरण-पोषण अलग अधिकार है। चाहे पत्नी गुज़ारा-भत्ता ले या न ले—
- बच्चों की पढ़ाई
- स्वास्थ्य
- रहन-सहन
की ज़िम्मेदारी माता-पिता दोनों पर होती है।
क्या गुज़ारा-भत्ता एक बार में भी मिल सकता है?
हाँ। कई मामलों में अदालत—
- एकमुश्त राशि (एक बार में)
- या मासिक भुगतान
का विकल्प देती है। कई दंपति आपसी सहमति से एकमुश्त समझौता कर लेते हैं, ताकि भविष्य में विवाद न रहे।
गुज़ारा-भत्ता को लेकर बढ़ते विवाद
अदालतों में ऐसे मामले भी सामने आ रहे हैं जहाँ—
- झूठे दावे
- आय छुपाना
- भुगतान से बचने के प्रयास
देखे जा रहे हैं।
इसी कारण न्यायालय अब—
- आय के दस्तावेज़
- बैंक विवरण
- जीवन-शैली
की गहराई से जाँच कर रही हैं।
विशेषज्ञों की राय
कानून विशेषज्ञ मानते हैं—
“गुज़ारा-भत्ता दंड नहीं, बल्कि सामाजिक संतुलन का साधन है।”
वहीं सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि इसका दुरुपयोग भी रोका जाना चाहिए, ताकि वास्तविक पीड़ित को न्याय मिल सके।
निष्कर्ष: गुज़ारा-भत्ता अधिकार है, एहसान नहीं
गुज़ारा-भत्ता कोई दया या
उपकार नहीं, बल्कि कानूनी अधिकार है।
इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना
है कि तलाक के
बाद भी व्यक्ति सम्मान
के साथ जीवन जी
सके।
लेकिन साथ ही यह भी ज़रूरी है कि—
इसका दुरुपयोग न हो
और अदालत निष्पक्षता से हर मामले को परखे
तलाक के बाद जीवन कठिन ज़रूर होता है, लेकिन कानून का प्रयास यही है कि यह असहनीय न बने।
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