कानून तक | विशेष रिपोर्ट
तलाक
के मामलों में जब भी
चर्चा होती है, तो
ज़्यादातर बातचीत महिलाओं के अधिकारों, भरण-पोषण और सुरक्षा
कानूनों तक सीमित रह
जाती है। लेकिन एक
सवाल अक्सर अनसुना रह जाता है—
“तलाक के बाद पुरुषों के अधिकार क्या हैं?”
क्या
तलाक के बाद पुरुष
पूरी तरह असहाय हो
जाते हैं?
क्या कानून उन्हें कोई सुरक्षा नहीं
देता?
और क्या अदालतें पुरुषों
की बात सुनती भी
हैं?
इस रिपोर्ट में हम इसी पहलू को आसान, संतुलित और ज़मीनी भाषा में समझने की कोशिश कर रहे हैं।
तलाक के बाद पुरुषों की स्थिति: ज़मीनी सच्चाई
तलाक केवल कानूनी प्रक्रिया नहीं होती, बल्कि यह मानसिक, सामाजिक और आर्थिक रूप से दोनों पक्षों को प्रभावित करता है। हालाँकि समाज में यह धारणा बनी हुई है कि—
“तलाक के बाद पुरुष की ज़िंदगी आसान होती है।”
लेकिन पारिवारिक अदालतों और सामाजिक रिपोर्ट्स कुछ और ही कहानी बताती हैं। कई पुरुष—
- बच्चों से अलग हो जाते हैं
- लंबी कानूनी लड़ाई में फँस जाते हैं
- आर्थिक दबाव झेलते हैं
- झूठे मामलों का सामना करते हैं
ऐसे में यह जानना ज़रूरी हो जाता है कि कानून पुरुषों को क्या अधिकार देता है।
क्या पुरुषों को भी कानून में अधिकार मिले हैं?
सीधा जवाब है—हाँ।
कानून
की भाषा लिंग-निरपेक्ष
होती है, यानी अधिकार
और दायित्व दोनों पक्षों के लिए होते
हैं।
समस्या अधिकारों की कमी नहीं,
बल्कि जानकारी की कमी है।
1. निष्पक्ष सुनवाई का अधिकार
तलाक के किसी भी मामले में पुरुष को यह अधिकार है कि—
- उसकी बात पूरी तरह सुनी जाए
- बिना सबूत के दोषी न ठहराया जाए
- अदालत में समान अवसर मिले
अदालतें आज यह स्पष्ट कर चुकी हैं कि तलाक का मामला भावनाओं पर नहीं, तथ्यों और सबूतों पर तय होगा।
2. झूठे आरोपों से बचाव का अधिकार
तलाक के दौरान कई मामलों में—
- घरेलू हिंसा
- दहेज उत्पीड़न
- मानसिक क्रूरता
जैसे आरोप लगाए जाते हैं। यदि ये आरोप झूठे या बढ़ा-चढ़ाकर लगाए गए हों, तो पुरुष के पास कानूनी उपाय मौजूद हैं। अदालतें अब यह मानने लगी हैं कि हर आरोप स्वतः सत्य नहीं होता और दुरुपयोग की संभावना को भी देखा जाना चाहिए।
3. गुज़ारा-भत्ता और भरण-पोषण में निष्पक्षता का अधिकार
आम धारणा यह है कि—
“पति को हर हाल में गुज़ारा-भत्ता देना ही पड़ेगा।”
लेकिन सच्चाई यह है कि अदालत कई बातों को देखती है:
- पत्नी की आय
- पति की आय
- दोनों की ज़रूरतें
- जीवन-स्तर
- आश्रितों की संख्या
यदि पत्नी आर्थिक रूप से सक्षम है और पति पर अत्यधिक बोझ पड़ रहा है, तो अदालत गुज़ारा-भत्ता को—
कम कर सकती है
सीमित अवधि के लिए तय कर सकती है
या कुछ मामलों में ख़ारिज भी कर सकती है
4. कामकाजी पत्नी के मामले में पुरुष के अधिकार
आज बड़ी संख्या में महिलाएँ नौकरीपेशा हैं। ऐसे मामलों में पुरुष का अधिकार है कि—
- पत्नी की वास्तविक आय की जाँच हो
- आय छुपाने पर अदालत को सूचित किया जाए
- भरण-पोषण निष्पक्ष रूप से तय हो
कई अदालतों ने यह साफ़ कहा है कि केवल महिला होना भरण-पोषण का स्वचालित आधार नहीं हो सकता।
5. बच्चों से मिलने और कस्टडी का अधिकार
तलाक के बाद बच्चों की कस्टडी अक्सर माँ को मिल जाती है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि पिता का कोई अधिकार नहीं होता।
पुरुषों को यह अधिकार है कि—
- वे अपने बच्चों से मिल सकें
- उनके पालन-पोषण में भाग ले सकें
- शिक्षा और स्वास्थ्य से जुड़े फैसलों में शामिल हों
यदि पिता बच्चे के लिए सुरक्षित और सक्षम है, तो अदालत विज़िटेशन राइट या जॉइंट कस्टडी भी दे सकती है।
6. मानसिक उत्पीड़न से सुरक्षा का अधिकार
तलाक की प्रक्रिया के दौरान पुरुषों को भी—
- मानसिक तनाव
- सामाजिक बदनामी
- कार्यस्थल पर प्रभाव
जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। यदि पत्नी या उसके परिवार द्वारा लगातार—
- धमकी
- बदनामी
- झूठे मुकदमों का दबाव
बनाया जा रहा हो, तो पुरुष के पास अदालत जाने का पूरा अधिकार है।
7. आपसी सहमति से तलाक का अधिकार
पुरुष को भी यह अधिकार है कि यदि रिश्ता निभाना संभव न हो, तो—
- आपसी सहमति से
- सम्मानजनक ढंग से
- बिना अनावश्यक आरोपों के
तलाक लिया जाए। आपसी सहमति से तलाक आज सबसे कम विवाद और कम समय लेने वाला तरीका माना जाता है।
8. आर्थिक शोषण से बचने का अधिकार
कुछ मामलों में देखा गया है कि—
- अत्यधिक गुज़ारा-भत्ता
- लंबी कानूनी लड़ाई
- बार-बार याचिकाएँ
पुरुषों को आर्थिक रूप से तोड़ देती हैं। अदालतें अब इस बात पर भी ध्यान दे रही हैं कि कानून का इस्तेमाल शोषण के लिए न हो।
9. पुनर्विवाह का समान अधिकार
तलाक के बाद पुरुष को भी यह अधिकार है कि—
- वह नई ज़िंदगी शुरू करे
- पुनर्विवाह करे
- सामाजिक रूप से सम्मान के साथ आगे बढ़े
कानून किसी भी पक्ष को जीवन भर सज़ा में नहीं रखता।
10. समाज और कानून के बीच की दूरी
कानून पुरुषों को अधिकार देता है, लेकिन—
- सामाजिक दबाव
- बदनामी का डर
- “पुरुष रोते नहीं” जैसी सोच
कई बार पुरुषों को चुप रहने पर मजबूर कर देती है। यही कारण है कि कई पुरुष अपने अधिकार जानते हुए भी उनका इस्तेमाल नहीं कर पाते।
विशेषज्ञों की राय
कानूनी विशेषज्ञ मानते हैं—
“तलाक
के मामलों में संतुलन ज़रूरी
है।
न तो महिला को
स्वचालित पीड़ित माना जाना चाहिए,
और न ही पुरुष
को स्वतः दोषी।”
अदालतों का रुख धीरे-धीरे इसी संतुलन की ओर बढ़ रहा है।
निष्कर्ष: तलाक के बाद पुरुष भी अधिकारों के हक़दार हैं
तलाक
किसी की जीत या
हार नहीं, बल्कि एक असफल रिश्ते
का अंत होता है।
कानून का उद्देश्य किसी
एक पक्ष को दबाना
नहीं, बल्कि—
- न्याय
- संतुलन
- और सम्मान
को बनाए रखना है। पुरुषों को भी अपने अधिकारों की जानकारी होनी चाहिए, ताकि वे—
- डर के बिना
- तथ्यों के आधार पर
- कानून के सहारे
अपनी बात रख सकें।
